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Puja & Vidhi


पूजा अथवा पूजन (Worshipping) किसी भगवान को प्रसन्न करने हेतु हमारे द्वारा उनका अभिवादन होता है। पूजा दैनिक जीवन का शांतिपूर्ण तथा महत्वपूर्ण कार्य है। यहाँ भगवान को पुष्प आदि समर्पित किये जाते हैं जिनके लिये कई पुराणों से छाँटे गए श्लोकों का उपयोग किया जाता है। वैदिक श्लोकों का उपयोग किसी बड़े कार्य जैसे यज्ञ आदि की पूजा में ब्राह्मण द्वारा होता है। सर्वप्रथम प्रथमपूज्यनीय गणेश की पूजा की जाती है।

 

पूजन करने के लिए तन और मन से शुद्ध होना अतिआवश्यक है, तत्पश्चात पूजन को नियम के तहत करना चाहिए | 

पूजन के प्रचलित प्रकार निम्न है -
पंचोपचार पूजन
दशोपचार पूजन
षोडशोपचार पूजन
राजोपचार पूजन

 

पंचोपचार पूजन


पंचोपचार पूजन में निम्न सामग्रियों द्वारा विधिपूर्वक पूजन ही पंचोपचार पूजन है |
गंधाक्षत - रोली,हल्दी, अक्षत (अखंडित चावल )
पुष्प - फूल माला (जिस ईश्वर का पूजन हो रहा है उसके पसंद के फूल और उसकी माला )

धूप - धूपबत्ती
दीप - दीपक (शुद्ध घी का इस्तेमाल करें )
नैवेद्य  - मिष्ठान भोग के लिए

 

दशोपचार पूजन
दशोपचार पूजन में निम्न दस तरीके द्वारा विधिपूर्वक पूजन ही पंचोपचार पूजन है |

 

पाद्य- पाद्यं, अर्घ्य दोनों ही सम्मान सूचक है। ऐसा भाव करना है कि भगवान के प्रकट होने पर उनके हाथ पावं धुलाकर आचमन कराकर स्नान कराते हैं |
अर्घ्य- अर्घ्य के विषय में पाद्य में बता दिया गया है |
आचमन- आचमन यानी मन, कर्म और वचन से शुद्धि आचमन का अर्थ है अंजलि मे जल लेकर पीना, यह शुद्धि के लिए किया जाता है। आचमन तीन बार किया जाता है। इससे मन की शुद्धि होती है।
स्नान- ईश्वर को शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है | एक तरह से यह ईश्वर का स्वागत सत्कार होता है |
वस्त्र- ईश्वर को स्नान के बाद वस्त्र चढ़ाये जाते हैं, ऐसा भाव रखा जाता है कि हम ईश्वर को अपने हाथों से वस्त्र अर्पण कर रहे हैं या पहना रहे है, यह ईश्वर की सेवा है |
गंधाक्षत - रोली, हल्दी, चन्दन, अबीर,गुलाल,अक्षत (अखंडित चावल )
पुष्प - फूल माला (जिस ईश्वर का पूजन हो रहा है उसके पसंद के फूल और उसकी माला )
धूप - धूपबत्ती
दीप - दीपक (शुद्ध घी का इस्तेमाल करें )
नैवेद्य  - मिष्ठान भोग के लिए

 

षोडशोपचार पूजन
षोडशोपचार पूजन में निम्न सोलह तरीके से  विधिपूर्वक पूजन ही षोडशोपचार पूजन है |

 

1. ध्यान-आवाहन- मन्त्रों और भाव द्वारा भगवान का ध्यान किया जाता है | 

आवाहन का अर्थ है पास लाना। ईष्ट देवता को अपने सम्मुख या पास लाने के लिए आवाहन किया जाता है। उनसे निवेदन किया जाता है कि वे हमारे सामने हमारे पास आए, इसमें भाव यह होता है। कि वह हमारे ईष्ट देवता की मूर्ति में वास करें, तथा हमें आत्मिक बल एवं आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करें, ताकि हम उनका आदरपूर्वक सत्कार करें। जिस प्रकार मनोवांछित मेहमान या मित्र को अपने यहां आया देखकर आनंद प्रसन्नता होती है।


2. आसन


3. पाद्य- पाद्यं, अर्घ्य दोनों ही सम्मान सूचक है। ऐसा भाव करना है कि भगवान के प्रकट होने पर उनके हाथ पावं धुलाकर आचमन कराकर स्नान कराते हैं |


4. अर्घ्य- अर्घ्य के विषय में पाद्य में बता दिया गया है |

5. आचमन- आचमन यानी मन, कर्म और वचन से शुद्धि आचमन का अर्थ है अंजलि मे जल लेकर पीना, यह शुद्धि के लिए किया जाता है। आचमन तीन बार किया जाता है। इससे मन की शुद्धि होती है।


6. स्नान- ईश्वर को शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है | एक तरह से यह ईश्वर का स्वागत सत्कार होता है | जल से स्नान के उपरांत भगवान को  पंचामृत स्नान कराया जाता है |

 

7. वस्त्र- ईश्वर को स्नान के बाद वस्त्र चढ़ाये जाते हैं, ऐसा भाव रखा जाता है कि हम ईश्वर को अपने हाथों से वस्त्र अर्पण कर रहे हैं या पहना रहे है, यह ईश्वर की सेवा है |


8. यज्ञोपवीत- यज्ञोपवीत का अर्थ जनेऊ होता है | भगवान को समर्पित किया जाता है। यह देवी को अर्पण नहीं किया जाता है।


9. गंधाक्षत - रोली, हल्दी,चन्दन, अबीर,गुलाल, अक्षत (अखंडित चावल )


10. पुष्प - फूल माला (जिस ईश्वर का पूजन हो रहा है उसके पसंद के फूल और उसकी माला )


11. धूप - धूपबत्ती


12. दीप - दीपक (शुद्ध घी का इस्तेमाल करें )

 

13. नैवेद्य  - भगवान को मिष्ठान का भोग लगाया जाता है इसको ही नैवेद्य कहते हैं |


14.ताम्बूलदक्षिणा, जल -आरती - तांबुल का मतलब पान है। यह महत्वपूर्ण पूजन सामग्री है। फल के बाद तांबुल समर्पित किया जाता है। ताम्बूल के साथ में पुंगी फल (सुपारी), लौंग और इलायची भी डाली जाती है | दक्षिणा अर्थात् द्रव्य समर्पित किया जाता है। भगवान भाव के भूखे हैं। अत: उन्हें द्रव्य से कोई लेना-देना नहीं है। द्रव्य के रूप में रुपए,स्वर्ण, चांदी कुछ की अर्पित किया जा सकता है। आरती पूजा के अंत में धूप, दीप, कपूर से की जाती है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। आरती में एक, तीन, पांच, सात यानि विषम बत्तियों वाला दीपक प्रयोग किया जाता है। आरती चार प्रकार की होती है :– दीपआरती- जलआरती- धूप, कपूर, अगरबत्ती से आरती- पुष्प आरती


15. मंत्र पुष्पांजलि- मंत्र पुष्पांजलीमंत्रों द्वारा हाथों में फूल लेकर भगवान को पुष्प समर्पित किए जाते हैं तथा प्रार्थना की जाती है। भाव यह है कि इन पुष्पों की सुगंध की तरह हमारा यश सब दूर फैले तथा हम प्रसन्नता पूर्वक जीवन बीताएं।


16. प्रदक्षिणा-नमस्कार, स्तुति -प्रदक्षिणा का अर्थ है परिक्रमा | आरती के उपरांत भगवन की परिक्रमा की जाती है, परिक्रमा हमेशा क्लॉक वाइज (clock-wise) करनी चाहिए | स्तुति में क्षमा प्रार्थना करते हैं, क्षमा मांगने का आशय है कि हमसे कुछ भूल, गलती हो गई हो तो आप हमारे अपराध को क्षमा करें।

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राजोपचार पूजन
राजोपचार पूजन में षोडशोपचार पूजन के अतिरिक्त छत्र, चमर, पादुका, रत्न व आभूषण आदि विविध सामग्रियों व सज्जा से की गयी पूजा राजोपचार पूजन कहलाती है | राजोपचार अर्थात राजसी ठाठ-बाठ के साथ पूजन होता है, पूजन तो नियमतः ही होता है परन्तु पूजन कराने वाले के सामर्थ्य के अनुसार जितना दिव्य और राजसी सामग्रियों से सजावट और चढ़ावा होता है उसे ही राजोपचार पूजन कहते हैं |

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